Sunday, February 14, 2010

Two States by Chetan Bhagat

It's a great attempt by our newly born (only four books old) with simple english, shallow understanding to try and portray the regionalism brooding in our society. Kudos! I tried my best to avoid the book for so long but finally it got me and here I am with a review on it. Sarcastic, humorous storyline which starts off this way but after the third act its sort of he's just dragging it to the end. What I found out was that there is a clear lack of understanding of a woman in his writing.
Yet again the storyline is pretty predictable.
Overall it's yet another masala story good for beginners and a bummer for regulars.

Saturday, October 24, 2009

संकोच -" Emotions of True Son"

हर इन्सान में कहीं कहीं होता तो है ही संकोच,
दूसरों को ही वोह खुशी देना चाहता है हर रोज़ ,
छिपाता है दूसरों से और सह लेता है ख़ुद दुःख,
बदले में जो भी मिले दुःख या फ़िर सुख

वह इंसान जो भी हो , होता तो है ही महान,
दूसरों का सोचने वाला वह कर देता है कीर्तिमान
वह ख़ुद नहीं जानता कितनी तकलीफें आएँगी और,
मदद तो करना ही है सबकी ,चाहे हो इंसान या फ़िर हैवान

माँ की ममता में भी संकोच छिपा रहता है,
दर्द होता है यदि पुत्र कुछ सहता है
ममता भी महानता का ही एक रूप लगती है,
यह महसूस करके पुत्र का भी अश्क निकल बहता है

वह अश्क में क्या क्या छिपा रहता है,
यह तो सिर्फ़ वह पुत्र ही जानता है,
दया,स्नेह,आदि से भरपूर वो अश्क,
जब निकलता है तो कभी नहीं ठहेरता है


पुत्र की स्थिती देखकर पिता उसे सहानुभूति देता है,
पुत्र सहानुभूति को भो माँ की ममता समझ लेता है,
पिता ,पुत्र और माँ का यह अनूठा रिश्ता,
भगवान् ही तो बाँध कर देता है.

Monday, June 15, 2009

Intezaar !! This poem I wrote on 20th may 2007 longing for the result!!

इंतज़ार

खोया हुआ बैठे बैठे करता हूँ मैं इंतज़ार,
बोर होता हूँ लगता है मुझे सबकुछ बेकार,
लगता है वक़्त थम सा गया है सदा के लिए,
बताओ भाई क्या समय का भी होता है व्यापार?

एक क्षण बिताना भी मुश्किल सा हो गया है,
अपने आप को ऐसे देखकर मन क्रोधित सा हो गया है,
कहाँ जाऊं , क्या करूँ, किस्से बात करूँ मैं?
इस दिशा को देखकर मन विचलित सा हो गया है

किताबों की टेबल और कुर्सी सूनी सी हो गई है,
चेहरे पर इंतज़ार और मन में मासूमियत सी हो गई है,
PET का समय आएगा जब,
तब कहूँगा , उन किताबों की फ़िर से ज़रूरत सी हो गई है

समय तो चलता है अपनी गति से हर बार,
विश्वास है की वो समय भी आएगा एक बार,
खुशी या ग़म उस समय पता चलेगा,
जब आएगी जीत या फ़िर हार की पुकार

क्या मालूम आगे क्या होना है?
हँसना है या फ़िर रोना है?
जो होता है अच्छे के लिए होता है,
यह मानके मन को अपने दतोलना है,
महनत का फल अवश्य ही मिलना है ,
तो फ़िर किस बात पर रोना है??